सफलता की कहानियां अक्सर, मेहनत के रंगों से लिखी जाती है. खेती की पारम्परिक पद्धतियों से हटकर तकनीकों का प्रयोग करने वाले किसान ज्यादा मुनाफा कमाते है. एक साधारण किसान राम सरन वर्मा कैसे बने से हाई-टेक एग्रीकल्चर के रोल मॉडल, जानिए उनकी सफलता की कहानी-
शुरूआती सफर –
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले के दौलतपुर गाँव में जन्मे राम सरन वर्मा कभी सामान्य किसान हुआ करते थे। केवल कक्षा आठ तक पढ़ाई करने वाले वर्मा ने कम उम्र में ही खेती का जिम्मा संभाल लिया। उनके पास विरासत में मिली मात्र 6 एकड़ ज़मीन थी, जिस पर वो पारंपरिक खेती जैसे गेहूं और धान उगाते थे
तकनीक की तलाश में किसान बना विद्यार्थी
वर्ष 1990 के दशक में राम सरन वर्मा ने खेती में नवाचार के लिए पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र और हरियाणा की यात्रा की। उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों से मुलाकात की, मॉडल फार्म देखे। टिश्यू कल्चर और फसल चक्र (Crop Rotation) के ज़रिए उत्पादन कई गुना बढ़ाने की पद्धतियों के बारे में जाना।बिना किसी औपचारिक डिग्री के, उन्होंने खेती के विज्ञान और प्रबंधन को समझा और “हाई-टेक फार्मिंग” की ओर रुख किया।
टिश्यू कल्चर और फसल चक्र को अपनाया –
राम सरन वर्मा ने केले की टिश्यू कल्चर आधारित खेती को उत्तर प्रदेश में सबसे पहले अपनाया। परंपरागत फसलों के मुकाबले इस तकनीक के प्रयोग ने उनके खेतों की उपज बढ़ा दी. जहाँ केले से 1 एकड़ में 41,000 किलोग्राम तक उत्पादन मिला वही आलू का उत्पादन प्रति एकड़ 25,000 किलोग्राम हुआ. साथ ही टमाटर की उपज 1 एकड़ में 40 टन तक हुई.
उनकी प्रसिद्ध “56‑इंच तकनीक” ने कम पानी में अधिक फसल देने का फॉर्मूला बना दिया। इस तकनीक में पौधों के बीच 56 इंच की दूरी रखी जाती है जिससे सिंचाई की ज़रूरत कम होती है और फसल बेहतर उगती है।
सफलता का सफर
किसान राम सरन वर्मा की मेहनत रंग लाई. वे वर्तमान में करीब 150 से 300 एकड़ ज़मीन पर खेती करते हैं। उन्होंने अपने फार्म पर आधुनिक सिंचाई प्रणाली, खेतों की मॉनिटरिंग के लिए मोबाइल तकनीक, मृदा परीक्षण, और फसल चक्र के वैज्ञानिक उपयोग जैसे उन्नत तरीके अपनाए हैं।
राम बनें किसान प्रशिक्षक
खुद सफलता के आयाम स्थापित करने के बाद किसान, राम सरन वर्मा ने हज़ारों किसानों की किस्मत भी बदली। वे अब तक 50,000 से अधिक किसानों को प्रशिक्षण दे चुके हैं. वै अपने फार्म पर 20,000 से अधिक लोगों को रोजगार दे रहे हैं. राम ने खेती को ऐसा व्यवसाय बना दिया जिसमें युवा भी वापस गाँव लौटकर खेती करना चाहते हैं. उन्होंने अपने फार्म को प्रशिक्षण केंद्र बना दिया है, जहाँ देशभर से किसान आते हैं और नवाचारों का प्रशिक्षण लेते है.
पद्म श्री पुरस्कार पाया

उनकी मेहनत और नवाचार को न सिर्फ किसानों ने, बल्कि देश ने भी सराहा। वर्ष 2012 में जहाँ पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने उन्हें “जादूगर किसान” की उपाधि दी. वहीं जगजीवन राम कृषि पुरस्कार, राष्ट्रीय बागवानी पुरस्कार भी उनको मिले। उनके बेहतरीन योगदान के लिए वर्ष 2019 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान प्रदान किया गया.
क्या सीख सकते हैं किसान
रामसरन की कहानी सिखाती है कि, खेती अगर विज्ञान और प्रबंधन के साथ की जाए तो सबसे मुनाफेदार काम बन सकती है।किसान जैविक तरीकों से जुड़ें, बाजार की माँग के अनुसार फसल उगाएँ, खुद को एक उद्यमी की तरह सोचें तो बहुत मुनाफा कमा सकते हैं.
राम सरन वर्मा की कहानी भारत के लाखों किसानों के लिए प्रेरणा है। उन्होंने साबित किया कि सीमित संसाधन, सीमित शिक्षा और छोटे गाँव से भी विश्वस्तरीय कृषि की जा सकती है—जरूरत है तो बस सोच को बदलने की। किसान रामसरन खेती को सम्मान, विज्ञान और सफलता से जोड़ने का प्रतीक बन गए हैं। उनकी कहानी से सीखकर किसान भाइयों आप भी नवीन तकनीकों को अपनाकर आर्थिक रूप से समृद्ध हो सकते हैं।

Be the first to comment