भारत में धान (पैडी) एक बेहद महत्वपूर्ण खरीफ फसल है, जो बरसात के मौसम में उगाई जाती है। यह फसल न केवल हमारे देश का मुख्य आहार है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी है। खरीफ धान की खेती आमतौर पर जून से जुलाई के बीच शुरू होती है, जब मानसून का पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है।
अनुकूल जलवायु एवं मिट्टी
धान की खेती के लिए गर्म और आर्द्र (नमी वाली) जलवायु सबसे उपयुक्त होती है। आदर्श तापमान 20°C से 35°C के बीच होना चाहिए। पानी की आवश्यकता अधिक होती है, इसलिए दोमट या जलोढ़ मिट्टी जो पानी को रोक सके, सबसे अच्छी मानी जाती है।

बीज तैयारी एवं रोपाई
बीज चयन: अधिक उत्पादन देने वाली और कीट-रोधक किस्में जैसे MTU-7029, IR-64 या सोना मसूरी का उपयोग लाभदायक होता है।
बीज उपचार: फफूंदनाशी (फंगीसाइड) से बीज का उपचार कर रोग से बचाव किया जाता है।
नर्सरी तैयारी: रोपाई से पहले 20-25 दिन के लिए पौध नर्सरी में तैयार की जाती है।
रोपाई: पौधों को 2-3 पौधे प्रति गड्डी, 20×15 सें.मी. की दूरी पर लगाना उचित होता है।
सिंचाई एवं पोषण प्रबंधन
धान की खेती में लगातार पानी की आपूर्ति बेहद जरूरी है, खासकर कल्ले (tillering) बनने
की अवस्था तक। खाद के लिए एनपीके अनुपात 100:50:50 किलो/हेक्टेयर बनाए रखना चाहिए। यूरिया को 3 हिस्सों में देना अधिक अच्छा होता है।
रोग एवं कीट नियंत्रण
ब्लास्ट रोग: इसके लिए ट्राइसाइक्लाजोल (Tricyclazole) का छिड़काव उपयोगी है।
ब्राउन प्लांट हॉपर: इमिडाक्लोप्रिड (Imidacloprid) का छिड़काव करके नियंत्रण किया जा सकता है।
खरपतवार नियंत्रण: रोपाई के 3-4 दिन बाद ब्यूटाक्लोर (Butachlor) का छिड़काव प्रभावी होता है।
कटाई एवं भंडारण
धान काटने का सही समय तब होता है जब 80-85% दाने पक चुके हों। कटाई के बाद धान को 14% से कम नमी पर भंडारित करना चाहिए, ताकि उसमें फफूंद न लग सके।
खरीफ धान की खेती लाभकारी है, यदि बीज से लेकर भंडारण तक हर चरण वैज्ञानिक तरीके से किया जाए। अच्छी किस्म, समय पर पानी और उचित रोग नियंत्रण से किसान उत्पादन बढ़ा सकते हैं और बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं।

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