कभी लोग कहते थे कि खेती और पशुपालन से घर नहीं चलता, लेकिन आज वही खेती और पशुपालन लाखों किसानों की आशा, सम्मान और पहचान बन चुके हैं। भारत के गाँवों से निकले कई किसान आज यह साबित कर चुके हैं कि अगर मेहनत ईमानदारी से की जाए तो मिट्टी भी सोना उगल सकती है और गाय-बैल भी खुशहाली के द्वार खोल सकते हैं। इन्हीं प्रेरक कहानियों को और ऊँचाई देने के लिए “सफल किसान गोकुल रत्न पुरस्कार” जैसा सम्मा न किसानों की जिंदगी में नई रोशनी लेकर आता है।यह पुरस्कार जीता है किसान सुरेंद्र अवाना ने. जाने क्या है उनकी सफलता की कहानी….
राजस्थान की माटी के लाल –
राजस्थान के भराना गाँव के सुरेन्द्र अवाना ऐसे ही एक प्रेरणास्रोत किसान हैं, जिन्हें इस तरह के पुरस्कार का वास्तविक हकदार माना जा सकता है।

क्या खासियत है उनके कामों की
इन्होंने गिर और साहिवाल गायों की नस्लों को संरक्षित किया और उनकी संख्या बढ़ाई। आधुनिक डेयरी तकनीक अपनाकर दूध की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों को बेहतर बनाया। साथ ही पिछले 13 वर्षों में इन्होंने एक लाख पेड़ लगाए और अपने खेत को हरा-भरा बना दिया।एकीकृत खेती और दुग्ध व्यवसाय से इनकी वार्षिक आय आज 50 लाख रुपये से अधिक है।अपने डेयरी प्रोजेक्ट में इन्होंने गाँव की महिलाओं को रोज़गार और प्रशिक्षण दिया।
किसान क्या सीख सकते है –
अवाना जी के कृषि सफ़र से किसान सीख सकते हैं कि – कृषि और पशुपालन केवल जीविका का साधन नहीं बल्कि गौरव और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।स्वदेशी नस्लों का संरक्षण केवल परंपरा नहीं बल्कि भविष्य की खाद्य सुरक्षा है। सतत खेती और हरित पहल से किसान न केवल लाभ कमा सकते हैं बल्कि पर्यावरण रक्षक भी बन सकते हैं।
आज जब गाँव के बच्चे सुरेन्द्र अवाना जैसे किसानों को देखते हैं तो उनकी आँखों में भी सपने जगते हैं सपने अपने खेतों को हरा-भरा बनाने के, सपने गायों की सेवा कर देश का नाम रोशन करने के, और सपने अपनी मिट्टी से ही सम्मान पाने के। सुरेंद्र जी को मिला “सफल किसान गोकुल रत्न पुरस्कार” केवल एक सम्मान नहीं, बल्कि यह उन किसानों की आवाज़ और आस्था है जो मानते हैं कि किसान सिर्फ अनाज पैदा नहीं करता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन, पर्यावरण और उम्मीद भी बोता है। उनकी कहानी हर दिल में यह विश्वास जगाती हैं कि अगर किसान सफल है, तो देश का भविष्य भी सफल है।
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