पशुओं में लंपी वायरस की बीमारी से मचने वाली तबाही देश देख चुका है. उत्तर भारत के कई राज्यों के साथ ही राजस्थान के पशु भी जब लंपी वायरस की चपेट में आते है और एक – दूसरे को संक्रमित कर देते है तो पशुपालकों की नींद -चैन सब खो जाता है. आप अपने पशुओं को कैसे इस रोग से बचा सकते है. जाने इस लेख में –
क्या है लम्पी रोग-
लम्पी रोग पशुओं में होने वाली एक वायरल बीमारी है जो मवेशियों, खासकर गायों और भैंसों को प्रभावित करती है, जिसमें त्वचा पर गांठें बन जाती हैं। यह कैप्री प्रॉक्स वायरस परिवार के एक वायरस के कारण होती है और मच्छरों, मक्खियों और टिकों जैसे कीड़ों के माध्यम से फैलती है। लक्षणों में बुखार, त्वचा पर गांठें, अंगों में सूजन और दूध उत्पादन में कमी शामिल हैं। इससे बचाव के लिए टीकाकरण सबसे प्रभावी तरीका है, और लक्षणों को कम करने के लिए एंटीबायोटिक्स व अन्य सहायक दवाएं दी जाती हैं।
लम्पी रोग के लक्षण
- बुखार: संक्रमण के लगभग एक सप्ताह बाद पशुओं को तेज़ बुखार आता है।
- त्वचा पर गांठें: त्वचा और श्लेष्मा झिल्ली (मुँह और नाक के अंदर की झिल्ली) पर 2-5 सेंटीमीटर की गांठें बन जाती हैं।
- सूजन (Edema): मवेशियों के अंगों में सूजन आ जाती है।
- लंगड़ापन: सूजन के कारण जानवर लंगड़ाने लगता है।
अन्य लक्षणों में आँखों और नाक से गाढ़ा स्राव निकलना, चारा खाने में परेशानी होना और दूध उत्पादन में कमी आना यह लक्षण दिखाई देते हैं।
रोग का कारण और संक्रमण का तरीका
यह रोग पॉक्सविरिडे परिवार के कैप्रिपॉक्स नामक एक वायरस के कारण होता है। मच्छर, मक्खियाँ और टिक्स जैसे कीड़े इस वायरस को फैलाते हैं। दूषित चारा और पानी के माध्यम से भी यह फैल सकता है।
पशुओं पर होने वाला प्रभाव
यह रोग होने से पशुओं की वृद्धि रुक जाती है, दूध का उत्पादन कम हो जाता है और बांझपन या गर्भपात भी हो सकता है। रोकथाम और उपचार
पशुओं को इस रोग से बचाना ज़रूरी है। लम्पी स्किन डिजीज वायरस के खिलाफ
टीकाकरण रोग की रोकथाम का सबसे प्रभावी तरीका है। चूंकि वायरस का कोई सीधा इलाज नहीं है, इसलिए वेटरनरी डॉक्टर को दिखाना ज़रूरी होता है. वह लक्षणों के आधार पर रोगग्रस्त पशुओं का इलाज करते है।
इसके ईलाज में एंटीबायोटिक्स (सेकेंडरी बैक्टीरियल संक्रमण के लिए), नॉन-स्टेरायडल एंटी-इन्फ्लेमेटरी दवाएं (सूजन कम करने के लिए) और एंटीहिस्टामाइन जैसी दवाएं वेटेरनरी डॉक्टर की सलाह लेकर दी जा सकती हैं।
पशुओं की देखभाल करने का तरीका –
संक्रमित जानवरों की त्वचा पर घावों के लिए मैरीगोल्ड (गेंदा) स्प्रे जैसे एंटीसेप्टिक का उपयोग किया जा सकता है, और उन्हें फिटकरी और नीम के पानी से नहलाया जा सकता है।
पशुपालक भाइयों , पशुओं में लाम्पी रोग होने से आपका बहुत नुकसान होता है क्योंकि पशुओं की त्वचा को स्थायी नुकसान होने से जानवरों का व्यावसायिक मूल्य कम हो जाता है। इसलिए इस रोग के निराकरण के लिए अपने गाय, भैंस का टीकाकरण ज़रूर करवाएं।

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